मैं ही आदिवासी हूं, आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं पर कविता

 जोहार दोस्तों

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दोस्तों मुझे लगता है कि एक आदिवासी निम्न प्रकार अपने बारे में कुछ सत्य धारणाएं रखता होगा-



 धरती मां का बेटा हूं मैं, मैं ही आदिवासी हूं

 कभी भील हूं कभी हूं सांसी, कभी मैं गारो खासी हूं

एकलव्य सी जिज्ञासा हूं, काली बाई सा तेज हूं

कुछ लिखा गया कुछ रह गया मैं इतिहास का वह पेज हूं

अन्याय का बदला लेता हूं मैं भगवन् बिरसा की संतान

 जोहार बोल कर कहता हूं मैं, मेरे माता-पिता और धरती महान

संस्कृति की नदियां हैं और परंपरा की झील है

वीरता का अप्रतिम उदाहरण नानक और टंट्या भील हैं

सौदा नहीं शादी होती है दहेज का कोई काम नहीं

बाल विवाह सी कुरीतियों का मेरे यहां कोई नाम नहीं 

झलकारी बाई सी वीरांगना इस समाज की अब भी ताकत है

हिमा दास के खेल में भी सुनो बड़ी नजाकत है

बंगलों में रहने से ज्यादा झोपड़पट्टी भाती हैं

पश्चिम से दूर में मौलिक हूं क्योंकि उधर की हवाएं खट्टी आती है

 मानगढ़ में शेरों को धोखे से गोरों ने मारा था

खरसावां के गोलीकांड में क्यों पता नहीं कौन हत्यारा था? 

सुहाग उजड़ने पर नारी को सती ना होना पड़ता था

 पुनर्विवाह का अधिकार था ना वर्षों रोना पड़ता था

जल जंगल जमीन प्यारी है ना ही मैं भोग विलासी हूं

धरतीपुत्र कहा जाता है मैं ही आदिवासी हूं

Thank you Friends 

जय हिंद जय भारत जय भारतीय वीर जय भारतीय सेना

Writer - RAJENDRA MINA

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